सफ़र मोह्हबत का करके तो देखो
इंतजार हमसफ़र का करके तो देखो
समझ जायेंगे प्यार को तुम्हारे
एक बार दिल से इज़हार तो करके देखो
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ऐ दोस्त तुम पे लिखना शुरू कहा से करूँ?
अदा से करूँ या हया से करूँ?
तुम्हारी दोस्ती इतनी खुबसूरत है.
पता नहीं की तारीफ जुबा से करू या दुआ से करूँ?…..
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बडी खामोशी से भेजा था गुलाब उसको…
पर खुशबू ने शहर भर में तमाशा कर दिया.
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तू रूठा रूठा सा लगता है
कोई तरकीब बता मनाने की
मैं ज़िन्दगी गिरवी रख दूंगा
तू क़ीमत बता मुस्कुराने की
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तुम छत पे ना जाया करो……..
शहर मेँ बेवजह, ईद की तारीख बदल जाती है…
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तुम खुश-किश्मत हो जो हम तुमको चाहते है…
वरना,
हम तो वो है जिनके ख्वाबों मे भी लोग इजाजत लेकर आते है…!!
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“कल किसी और ने खरीद लिया तो शिकायत ऩ करना,
इसलिए आज हम सबसे पहले तेरे शहर मे बिकने आये है.”
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कुछ ऐसी मुह्हबत उसके दिल में भर दे या रब।।
वो जिसको भी चाहे वो “मैं” बन जाऊं।।
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मुस्करा के जो देखा तो कलेजे में चुभ गये………
खँजर से भी तेज लगती हैं आँखे जनाब की…..!!
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मैं जानता हूँ …. फिर भी पूछता हूँ …
तुम आईना देख कर बताओ … मेरी पसंद कैसी हैं .…
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अपनी दोस्ती का बस
इतना सा असूल है…
ज़ब आप कुबूल है तो
आपका सब कुछ कुबूल है..
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